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संस्कृत भाषा में केवल एक या दो वर्णों के प्रयोग से पूरे श्लोक की रचना की गई है। कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं।
माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल "भ" और "र " दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है-
"भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे। भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।"
अर्थात् - धरा को भी वजन लगे ऐसे वजनदार, वाद्य यंत्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया।
किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल "न" व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोड़े में बहुत कहा है:-
"न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।"
अर्थात् - जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है।।
महाकवि माघ के “शिशुपाल वध” से एक श्लोक केवल द वर्ण में -
"दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः ।
दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः ।।"
अर्थात् - दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले,दुष्टमर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले,राक्षसों का खण्डन करने वाले ने शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया ।
संस्कृत वर्णमाला के 33 वर्ण जिस एक ही श्लोक में समाहित हो गए हों वह श्लोक कौन सा है?
क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।
अर्थात् - पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का , दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर व्यक्ति को शत्रुओं का भी आशीष प्राप्त होता है।
आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस पद्य में आ जाते हैं। इतना ही नहीं, उनका क्रम भी यथायोग्य है।
'रामरक्षास्त्रोत्र' में प्रयुक्त निम्नांकित श्लोक में 'राम' शब्द के आठ रूप आये हैं जो क्रमशः 7 विभक्तियों (संबोधन साथ) के एकवचन के रूप हैं।
"रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे।
रामेण अभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामात् नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहम्।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम ! मामुद्धर।।"
अनुवाद - राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं । मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ । सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ । श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं । मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ । मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ । हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें ।
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