28/08/2023

10.12 अन्योक्तयः [40 Marks]

द्वादशः पाठः - अन्योक्तयः

एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत्‌ । 
एक राजहंस से जो शोभा तालाब (नदी) की होती है।

न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना ॥1॥ 
वह शोभा किनारों पर चारों ओर रहने वाले हजारों बगुलों से नहीं होती है अर्थात् एक विद्वान से संसार अथवा समाज का कल्याण (शोभा) होता है परन्तु उसी समाज में रहने वाले हजारों मूर्खों से उसकी शोभा नहीं होती है।

भुक्ता मृणालपटली भवता निपीतान्यम्बूनि यत्र नलिनानि निषेवितानि।
जहाँ आपने कमलनाल के समूह को खाया है, जल को अच्छी तरह से पीया है,
कमल के फूलों का सेवन किया हैं।

रे राजहंस! वद तस्य सरोवरस्य,कृत्येन केन भवितासि कृतोपकार: ॥ 2॥
हे राजहंस! बोलो, उस तालाब (सरोवर) का किस काम से किया गया उपकार चुकाओगे? 

अर्थात् जिस देश, जाति, धर्म और संस्कृति से हे मानव! तुम्हारा यह जीवन बना (निर्मित) हुआ है उसका बदला किस कार्य से चुका सकोगे? अतः इन सभी के ऋणी रहो और सम्मान करो।

तोयैरल्पैरपि करुणया भीमभानौ निदाघे, 
हे माली! सूर्य के तेज चमकने (तपने) पर गर्मी के समय में

मालाकार! व्यरचि भवता या तरोरस्य पुष्टि: । 
हे माली ! आपके द्वारा थोड़े से जल से भी आपने दया के इस पेड़ की जो पुष्टि (बढ़ोतरी) की है।


सा किं शक्या जनयितुमिह प्रावृषेण्येन वारां, 
जलों को वर्षा काल के चारों ओर से धाराओं के

सा किं शक्या जनयितुमिह प्रावृषेण्येन वारां, 
प्रवाहों को भी बिखरते हुए (बरसाते हुए)

धारासारानपि विकिरता विश्वतो वारिदेन ॥3॥ 
बादल से इस संसार में वह (पेड़ की) पुष्टि क्या की जा सकती है?


आपेदिरेऽम्बरपथं परित: पतग:, 
पक्षियों ने चारों ओर से आकाशमार्ग को प्राप्त कर लिए हैं।

भृग रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते । 
भौरे आम की मंजरियों को आश्रय बना लिए हैं।

सड्कोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो, 
सरोवर तुम्हारे संकुचित होने (सूखने) पर अरे निराश्रित (अनाथ)

मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु ॥ 4॥ 
मछली निश्चय से किस गति को प्राप्त करेगी (करे)।



एक एव खगो मानी वने वसति चातक: । 
एक ही स्वाभिमानी पक्षी चातक (चकोर) वन में रहता है

पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम्‌ ॥5॥ 
जो या तो प्यासा ही मर जाता है या फिर इन्द्र से (अपने लिए) वर्षा जल की याचना करता है।

अर्थात् चकोर पक्षी की तरह संसार में स्वाभिमानी व्यक्ति भी अपने सम्मान व निर्धारित मर्यादा के साथ जीते हैं। नियमों से विरुद्ध अथवा अमर्यादित जीवन जीने की अपेक्षा वे मरना अधिक पसन्द करते हैं।


आश्वास्य पर्वतकुलं तपनोष्णतप्त- 
सूर्य की गर्मी से तपे हुए पर्वतों के समूह को तृप्त करके

मुद्दामदावविधुराणि च काननानि । 
और ऊँचे वृक्षों (लकड़ियों) से रहित वनों को (तृप्त करके)
नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा, 
अनेक नदियों और सैकड़ों नदों (नालों) को जल से पूर्ण (भर) करके भी

रिक्तोऽसि यज्जलद! सैव तवोत्तमा श्री: ॥6॥
हे बादल! यदि तुम खाली हो तो तुम्हारी वही उत्तम शोभा है


रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयताम् 
हे मित्र चातक पक्षी! सावधान मन से क्षणभर (तनिक) सुनो। 

अम्भोदा बहवो भवन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशा: । 
आकाश में निश्चय से बहुत से बादल हैं परन्तु सभी ऐसे (एक जैसे) नहीं हैं।

केचिद्‌ वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद्‌ वृथा, 
उनमें से कुछ धरती को बारिश से भिगो देते हैं और कुछ बेकार में गरजते (ही) हैं,

यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वच: ॥7॥ 
तुम जिस-जिस को (सम्पन्न) देखते हो उस-उस के आगे अपने दुःख भरे वचनों को मत बोलो।

अर्थात् सभी के आगे अपने दुःख को प्रकट करके हाथ फैलाना उचित नहीं होता। इससे अपना अपमान होता है और सभी उदार भी नहीं होते हैं। अतः सभी के आगे रोना और माँगना उचित नहीं है।

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