चतुर्थः पाठः - शिशुलालनम्
प्रस्तुतोऽयं पाठः दिङ्नागविरचितः संस्कृतस्य प्रसिद्धनाट्यग्रन्थः “कुन्दमाला" इत्यस्य पञ्चमाङ्कात् सम्पादनं कृत्वा सङ्कलितोऽस्ति । अत्र नाटकांशे रामः स्वपुत्रौ लवकुशौ सिंहासनम् आरोहयितुम् इच्छति किन्तु उभावपि सविनयं तं निवारयतः । सिंहासनारूढः रामः उभयोः रूपलावण्यं दृष्ट्वा मुग्धः सन् स्वक्रोडे गृह्णाति । पाठेऽस्मिन् शिशुवात्सल्यस्य मनोहारिवर्णनं विद्यते।
यह पाठ संस्कृतवाङ्मय के प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला' के पंचम अङ्क से सम्पादित कर लिया गया है। इसके रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नाग हैं। इस नाटकांश में राम कुश और लव को सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं किन्तु वे दोनों अतिशालीनतापूर्वक मना करते हैं। सिंहासनारूढ राम कुश और लव के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर उन्हें अपनी गोद में बिठा लेते हैं और आनन्दित होते हैं। पाठ में शिशु स्नेह का अत्यन्त मनोहारी वर्णन किया गया है। नाट्य-प्रसङ्गः
कुन्दमाला के लेखक दिङ्नाग ने प्रस्तुत नाटक में रामकथा के करुण अवसाद भरे उत्तरार्ध की नाटकीय सम्भावनाओं को मौलिकता से साकार किया है। इसी कथानक पर प्रसिद्ध नाटककार भवभूति का उत्तररामचरित भी आश्रित है । कुन्दमाला के छहों अङ्कों का दृश्यविधान वाल्मीकि- तपोवन के परिसर में ही केन्द्रित है। प्रस्तुत नाटकांश पञ्चम अङ्क से सम्पादित कर सङ्कलित किया गया है। लव और कुश से मिलने पर राम के हृदय में उनसे आलिंगन की लालसा होती है। उनके स्पर्शसुख से अभिभूत हो राम, उन्हें अपने सिंहासन पर, अपनी गोद में बिठाकर लाड़ करते हैं।
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